"रोटी तो खानी हैं"
"रोटी तो खानी हैं" कभी रुखी कभी सूखी रोटी तो खानी हैं थोडीसी खुशिया बाकी आँखो में पानी हैं..... कभी रुखी कभी सुखी रोटी तो खानी हैं !!१!! मन हैं दुःखों से भरा बडी दुःखभरी जिन्दगी की एक अजब कहानी हैं... कभी रुखी कभी सूखी रोटी तो खानी हैं...!!२!! खूब सारी मेहनत मिलती मजदूरी थोडी मनमानी औरो की सहनी हैं... कभी रुखी कभी सूखी रोटी तो खानी हैं.... !!३!! आज मन परेशान हैं खुषीयो की एक आसं कभी तो शाम सुहानी सबके आंगण आनी हैं... कभी रुखी, कभी सूखी रोटी तो खानी हैं....!!४!! दिनांक:२२/०८/२०२२ कवि: जनार्दन बाळा गोरे औरंगाबाद. @जनार्दन