*एक शाम सुहानी*

 *एक शाम सुहानी*


धूप की चादर, हो गयी धीमी,

लगने लगी, शाम बड़ी सुहानी |

 मन को बहकाते, हवा के झोके

धूप और सर्दी की अलग कहानी ||1||


  सुनहरे पल सुहानी शाम के,

भूले ना मन, धूप के डर से |

  तेज किरणें धरा की ओर,

बरसाते गर्मी खूब जोर से ||२||


पतझड़ का मौसम धूप में,

बदल जाता हरे- भरे रूप में।

एक शाम सुहानी आती

"पहचान"खुद- खुद की बतलाती ||3||


कवि: जनार्दन बाळा गोरे

औरंगाबाद.@जनार्दन

दिनांक:03/05/2022.

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