*तू रूक ना कही*
*तू रूक ना कहीं*
"तू रूक ना कही" मुसाफिर,
खुद बना अपनी तकदीर।
डर छोड़ दे कोसों दूर,
ना समझ खुद को मजबूर ||१||
हालात बदल जायेंगे जरुर,
बस कोशिशें कर भरपूर।
उतार चढ़ाव आते ही रहेंगे,
इससे हम दूर नहीं होंगे ||२||
मन की मायूसी को छोड़कर,
सपनों का रुख मोड़कर।
जीना हैं तुम्हें सब जानकर,
कभी जीतकर तो कभी हारकर ||३||
तू रूक ना कहीं,
रास्तों को देखकर सही।
जीकर जिन्द़गी मनचाही
बातें भुला कही अनकही ||४||
कवि: जनार्दन बाळा गोरे औरंगाबाद.
@जनार्दन
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