"झलक"

 

विषय: "झलक"

तेरी एक झलक दिखी

हुंआ प्रसन्न, मन जो था दुःखी

तरस गयी थी आंखे मेरी

बस जुडी थी यादे तेरी ||१||


नजरो ने छोडा,ऐसा तीर

बदल गयी, मेरी मानो तकदिर

झलक तेरी पाने को तरसा

हो गया मन यह पागल सा ||२||


सूबह से शाम तक

दिन से रात तक

दिखं जाए झलक तेरी

ख्वाहीश हो जाए पूरी ||३||


तुने भी रूप खूब पाया

हर वक्त, मुझे ही आजमाया

सुंदरता तूजमे ऐसी हैं भरी

तेरी हर झलक लगती प्यारी ||४||


दिनांक 17/04/2022


कवी: जनार्दन बाळा गोरे औरंगाबाद.

@औरंगाबाद.

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