"एक आशा गरीब की"

 "एक आशा गरीब की"

कुछ ज्यादा नहीं होती

एक आशा गरीब की

बस दो वक्त की रोटी

भुख मिटे बस पेट की//१//


उम्मीद नहीं ज्यादा पाने की

भूख नहीं ज्यादा खाने की

जिन्दगी सवर जाए हमारी

बस इतनिसी आसं जिने की//२//


मन उदास ना रहे कभी

इतना ही हम चाहते है

धन की लालसा से दूर

आठो पहर रहना चाहते हैं//३//


गरीब को मिलती चैन की सांस

नही रहती कभी जिन्दगी उदास

मनचाहा मिले ना मिले सूख जीवन में

कोई गम नहीं, जीवन बिते आशावो में//४//


आशा ना करे निराशा कभी

पूरी हो हर ख्वाहीशे सभी

दुःख दर्द सब भुलाकर जिते

"गरीब"जिन्दगी का हर गम पिते//५//

दिनांक १८/०१/२०२२

  कवी: जनार्दन बाळा गोरे

औरंगाबाद.

@जनार्दन

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