"हे इंसान"

 " हे इंसान"

क्यो फिक्र में डुबा कल के

आज की जिंदगी जी ले खुशिसे

पल, पल चल रहा हैं आगे

डर ना तू किसी भी बात से//१//

आज का दौऱ अलग जरूर हैं

धुंद बारिश का फैला कहर हैं

यह दिन भी गुजर जायेंगे

अवसर खुशियो के आयेंगे //२//

हे इंसान कुछ तो सोचा होगा

प्रकृती ने तेरे उज्वल भविष्य के लिये

चूने होगे सपने सुहाने खास

क्यो सोचता हैं कल के लिये//३//

कवि: जनार्दन बाळा गोरे

औरंगाबाद.@जनार्दन

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