"आत्मनिर्भर मन"

 "आत्मनिर्भर मन"

कोई जिये या चाहे मरे

किसी को कुछ नहीं लेना

सबको खुद की पडी हैं

यह कलियुग हैं यह जाना....//1//

सब सोचते अपना, अपना

भूल गये सब नाता पुराना...

अब ज्यादा कुछ ना सोचना

यह कलियुग हैं यह जाना.... कोई//2//

बात कोई सूने ना किसकी

बात चलाये अपने, मन की

क्या खोना क्या पाना....

यह कलियुग हैं यह जाना....//3//

अपना हल खुद ही जानो

अच्छे, बुरे को पहचानो

अब मन ही मन चुप रहना

यह कलियुग हैं यह जाना....!!४!!

कवि: जनार्दन बाळा गोरे औरंगाबाद.

@जनार्दन ©®

दिनांक 06/09/2021

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