"बारिश"
"बारिश"
थम जा जरा कम बरसात कर 2
पाणी हि पाणी दिखे ईधर उधर...2
थम जा जरा, कम बरसात कर.2//1/
जम गया है पाणी, हो रही हैं हानी
कबतक चलेगी तेरी यह मनमानी
हो रही खराब सारी फसल.....
थम जा जरा कम बरसात कर 2//2//
जीव सारे हो रहे परेशान
पाणी के डर से आ गयी थकान
कुछ तो होने दे खुदपर असर.......
थम जा जरा कम बरसात कर 2//3//
कर खुला सारा आसमान
अब सब के मन तु पहचान
रुककर अब कम कर फिकर.....
थम जा जरा कम बरसात कर 2//4//
दिनांक 22/09/2021.
कवि जनार्दन बाळा गोरे औरंगाबाद.
@जनार्दन
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