"ये कैसी मजबुरी "

"  ये कैसी मजबुरी "

मन की मुराद

नही होती पुरी

हालत रहती बुरी

ये कैसी मजबुरी //१//

सपने होते हजार

इंसान रहता बेजार

पीछे लगती बीमारी

ये कैसी मजबुरी  //२//

लगी मन को आशा

हर बार होती निराशा

दूर कब होगी बेकारी

ये कैसी मजबुरी. //३//

निंद नही रातो को

सहना पडता बातो को

सही ग्यांन की नही जानकारी//४//

दिनांक 21/08/2021

कवी: जनार्दन बाळा गोरे.

औरंगाबाद.

@जनार्दन.

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