"कालिया मर्दन"

 "कालिया मर्दन"

खेल रहे थे कृष्ण, मित्र

एकसाथ यमुनाजी तट पर

श्वेत वर्ण, पितांबर सुन्दर

मयुर पंख, सुशोभित सिरपर!!१!!

खेलते, खेलते गेंद गिरी पाणी में

मग्न मित्र सारे बाते सूनाने में

क्षणभर रुके नहीं, कृष्णप्रभू

पेड से कुदे सिधे कालिया डोह में!!२!!

पाणी खूब गहरा, कालिया डोह का

नाप नहीं था,कालिया के क्रोध का

क्रोध में फुत्कार कर आया कालिया

सिर पर नाचे खूब कृष्ण कन्हैया!!३!!

हराकर कालिया को किया गर्वहरण

तब से नाम प्रचलित "कालिया मर्दन"

जलशुद्ध यमुनाजी का किया

सबक कालिया नाग को सिखाया!!४!!

बहुत सारी हैं कृष्ण की लिला

मनमोहन कहे,कोई बासुरिवाला

"जन्माष्टमी"मनाते सारे भक्त 

होकर अपने, काम से विरक्त!!५!!

दिनांक 31/08/2021.

कवि: जनार्दन बाळा गोरे औरंगाबाद.

©®@जनार्दन.

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